‘चड्डा, नड्डा, गड्ढा’ पर भारी पड़ रहा है ‘दीदी ओ दीदी’

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डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’


वर्तमान की पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में उपयोग किये जाने वाले, नारे, मुहावरे, व्यंग, तंजों को देखकर, सुनकर लगता है अपमानजनक शब्दों के जबाव में यदि सभ्य शब्द भी एक लहजे में कहे जायें तो वे असभ्य शब्दों से भी अधिक प्रभावकारी होते हैं। भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के द्वारा पश्चिम बंगाल में चुनावी रैली किये जाने पर वहां की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी द्वारा नड्डा जी के लिए ‘चड्डा, नड्डा, गड्ढा, भड्डा’ जैसे संबोधन के बाद भी पश्चिम बंगाल की चुनावी रैलियों में बी.जे.पी. के नेता सधे हुए शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी तो अपनी चुनावी सभाओं में जब ‘दीदी... ओ दीदी’ बोलते हैं तो जनता अभिवादन में एक आवाज के साथ हाथ ऊपर उठा देती है। इस पर भी टीएमसी की ओर से आपत्ती ली गई है। टीएमसी की महिला नेत्रियों और स्वयं ममताजी ने ‘दीदी.. ओ दीदी’ कहना महिलाओं का अपमान बताया है। अब नरेन्द्र मोदी जी कभी कभी  ‘आदरणीय दीदी’ भी बोल देते हैं, लेकिन असर कम नहीं हुआ। अतीत में देखें तो जिन्होंने भी अपने विरोधी के खिलाफ अपशब्द बोले हैं उन्हें चुनावों में फायदा की बजाय नुकसान ही उठाना पड़ा है।
कांग्रेस का पूर्व में गणित रहा है कि बहुसंख्यक में तो अधिकतर पारंपरिक वोट उनके हैं ही, अल्पसंख्यकों को साध लिया जाय तो विजय मिलेगी। यह फार्मूला तब तक प्रभावी था जब तक बहुसंख्यकों की खुलकर बात करने वाली कोई बड़ी प्रभावी पार्टी मैदान में नहीं थी। भातीय जनसंघ द्वारा अपने नेताओं को आरएसएस की शाखाओं में जाने पर प्रतिबंध लगाकर भाजपा को अस्तित्व में आने पर मजबूर किया गया। गिरती-उठती भाजपा आज भारत की सबसे लोकप्रिय और सबसे बड़ी व अनुशासित पार्टी है। संघ से पूर्णतया नियंत्रित भाजपा ने कांग्रेस की उस अल्पसंख्यक तुष्टीकरण नीति के उलट कार्य किया और बहुसंख्यकों के हित की बात प्रत्येक अवसर पर की, जिसका उसे अच्छा रिसपोन्स मिला, साथ ही अल्पसंख्यकों को भी साधे रखा। पश्चिम बंगाल के पिछले लोकसभा चुनावों में मिली भारी सफलता को देखकर भाजपा ने तभी से बंगाल विजय की अपनी रणनीति तैयार कर ली तथा पूरी मेहनत की। चुनाव आते आते टीएमसी के कई नेताओं ने बीजेपी का दामन थाम लिया। चुनाव घोषित होने पर तो जैसे टीएमसी में भगदड़ सी मच गई। अप्रैल 2019 में मोदी जी ने कहा था टीएमसी के 40 विधायक उनके सम्पर्क में हैं, भाजपा के आम चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी छोड़ देंगे। नेताओं पर ऐसे बयानों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है।
भाजपा द्वारा पश्चिम बंगाल में दुर्गा-मूर्ति विसर्जन और सरस्वती पूजा के लिए कोर्ट की इजाजत लेने की विवशता की बात को ऐसी कोई रैली, प्रेसवार्ता, सभा नहीं होती जिसमें उल्लेख न किया जाता हो। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की उस घटना को इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया में खूब कवरेज मिला जिसमें ममताजी के गुजरते काफिले को देखकर एक युवक ने ‘जयश्रीराम’ का नारा लगाया, ममताजी ने काफिला रोककर उस युवक को डांट पिलाई। पश्चिम बंगाल में मोदीजी के एक कार्यक्रम में दर्शकों ने ‘जयश्रीराम’ का नारा लगाया तो ममता जी इसे अपना अपमान कहकर कार्यक्रम छोड़कर चली आई। इन घटनाओं को भी बीजेपी खूब भुना रही है। एक और घटना हुई थी सम्भवतः ममताजी का एक कार्टून एक लड़की ने फेसबुक पर लाईक किया था, इस पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। इन सब को देखकर बहुसंख्यकों का गुस्सा टीएमसी के प्रति बढ़ गया है। ऐसे में जैसा कि बीजेपी दावा कर रही है ‘अबकी वार 200 पार’, इस संख्या को बीजेपी छू ले तो कोई आश्चर्य नहीं। असभ्य व्यवहार/भाषा पर सभ्य व्यवहार/भाषा हमेशा भारी पड़ी है।

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