पत्रकार को धमकी देने वाले बिल्डर के खिलाफ केस दर्ज़,बिल्डर व गुर्गे फरार

युरेशिया नई दिल्ली। विश्व पत्रकार महासंघ दिल्ली प्रदेश ने मध्य जिला पुलिस उपायुक्त संजय भाटिया व एडिशनल डी सी पी रोहित कुमार मीणा को ज्ञापन व मांग पत्र सौंप कर पत्रकार मणि आर्य को धमकी देने वाले बिल्डर के खिलाफ मुकदमा दर्ज़ करके कार्रवाई की मांग की थी। पत्रकार मणि आर्य ने दिल्ली के पहाड़गंज में बाराही माता मंदिर में चल रहे अवैध निर्माण और निगम में फैले भ्रष्टाचार और भू - माफिया बिल्डर द्वारा सरकारी भूमि पर कब्जे को लेकर खबर को प्रकाशित की थी। जिसके बाद अब दिल्ली पुलिस ने सच दिखाकर प्रशासन को जगाने वाले स्थानीय पत्रकार मणि आर्य को धमकी देने वाले बिल्डर व उसके गुर्गों के खिलाफ नबी करीम थाना पुलिस भारतीय दंड सहिंता की धारा 506 के अंतर्गत रिपोर्ट संख्या 0013/2020 के तहत ने जान से मारने की धमकी देने का केस दर्ज़ कर लिया है। केस दर्ज़ होने की भनक लगते ही गिरफ्तारी के डर से आरोपी बिल्डर और उसके कई गुर्गे भूमिगत हो गए हैं। गौरतलब है की स्थनीय जनप्रतिनिधियों से सांठगांठ करके बिल्डर बड़े पैमाने पर अवैध निर्माण करने में माहिर माना जाता है इसलिए निगम पार्षद से लेकर महापौर तक मंदिर पर अवैध निर्माण को

ओली की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा

श्याम सुंदर भाटिया 

नेपाल में सत्तारुढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-सीपीएन बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी पुष्प कमल दहल उर्फ़ प्रचंड में जबर्दस्त टकराव है। हालात यह हैं, सत्ताधारी दल-सीपीएन फूट की कगार पर है। दरअसल दोनों नेताओं के बीच मुख्य विवाद एक व्यक्ति-एक पद नियम को लेकर है। प्रचंड कहते हैं, इसे लागू करो, लेकिन ओली हैं कि मानते ही नहीं। ओली प्रधानमंत्री पद के संग-संग सीपीएन के अध्यक्ष पद पर काबिज हैं। कहने का अभिप्राय यह है, तराजू के दोनों पलड़ों पर ओली का एकाधिकार है। दोनों दिग्गज और उनके समर्थक कतई झुकने को तैयार नहीं हैं। तक़रीबन नौ माह में इन सियासी दिग्गजों के बीच समझौता-संवाद के 10 दौर हो चुके हैं, लेकिन अब सुलह की नाउम्मीदी साफ-साफ दिखाई दे रही है। आंतरिक कलह इतनी बढ़ गई है, सीपीएन कभी भी टूट सकती है। ऐसे में ओली सरकार की विदाई तय-सी है। हालाँकि ड्रैगन की प्लानिंग किसी भी कीमत पर ओली की सरकार बचाने की है। प्रचंड और दल के सीनियर लीडर-माधव कुमार नेपाल ओली से इस्तीफा मांग चुके हैं। नेपाल की प्रतिनिधि सभा में सीपीएन को दो तिहाई बहुमत प्राप्त है। मौजूदा वक्त में यह सबसे बड़ी पार्टी है। प्रधानमंत्री ओली की राष्ट्रपति विद्या भंडारी और चीनी राजदूत होउ यांकी की ओली से मुलाकातों का दौर जारी है। दरअसल ओली प्रचंड के एक पत्र से उखड़े हुए हैं, जिसमें उन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ओली चाहते थे, केंद्रीय सचिवालय की बैठक से पहले प्रचंड पत्र को वापस ले लें, लकिन प्रचंड टस से मस न हुए। सचिवालय की मीटिंग करने को अडिग रहे। प्रचंड राजदूतों और मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर भी ओली से खासे नाराज हैं। प्रचंड खेमा यह भी मानता है, कर्नाली प्रांत के मुख्यमंत्री महेंद्र बहादुर शाही के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के पीछे भी ओली खेमे का हाथ है। यह बात दीगर है, सीपीएन में दूसरी पांत के लीडर्स ओली और प्रचंड के बीच रात-दिन एक किए हुए हैं। अंततः प्रधानमंत्री ओली ने बगावती नेताओं पर गंभीर आरोप लगाया है, वे सरकार को गिराने का षड्यंत्र रच रहे हैं।    

प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके प्रतिद्वंद्वी प्रचंड की भेंट के बाद पार्टी में उभरे मतभेद के मद्देनजर सीपीएन के केंद्रीय सचिवालय की बहुप्रतीक्षित महत्वपूर्ण बैठक 18 नवम्बर को हुई। सीपीएन के अध्यक्ष ओली और सचिवालय के दीगर सदस्यों ने पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रचंड की पहल पर प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास पर बैठक में शिरकत की। प्रधानमंत्री ओली किसी ना किसी कारण से अब तक इस बैठक से बच रहे थे। हालाँकि केंद्रीय सचिवालय की बहुप्रतीक्षित इस महत्वपूर्ण बैठक में गतिरोध दूर नहीं हो सका। पार्टी से विचार-विमर्श किए बिना सरकार चलाने के प्रचंड के आरोपों के जवाब में प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने अलग राजनीतिक दस्तावेज पेश करने के लिए 10 दिन का समय देने की मांग की। प्रधानमंत्री ओली के बालुवातार स्थित आधिकारिक निवास पर जैसे ही बैठक शुरू हुई ओली ने सचिवालय के सदस्यों से कहा, वह अगली बैठक में अलग राजनीतिक दस्तावेश पेश करेंगे। इसे तैयार करने के लिए 10 दिनों का वक्त माँगा, इसीलिए सचिवालय की अगली बैठक अब 28 नवंबर को होगी। बैठक में पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रचंड की ओर से दिए गए 19 पन्नों की राजनीतिक रिपोर्ट पर चर्चा होने की संभावना थी। सत्तारुढ़ दल के सूत्रों के मुताबिक प्रचंड ने ओली पर पार्टी से विचार-विमर्श किए बिना और पार्टी के नियम-कायदे के विपरीत सरकार चलाने का आरोप लगाया था। ओली ने मौजूदा सत्ता संघर्ष के समाधान के लिए केंद्रीय सचिवालय के सभी नौ सदस्य इस अहम बैठक में मौजूद थे। बैठक में प्रचंड ने अपनी राजनीतिक रिपोर्ट में कई मुद्दे उठाए हैं। इसमें भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के प्रमुख सामंत कुमार गोयल के साथ ओली की हालिया मुलाकात के संबंध में पार्टी सचिवालय को अवगत नहीं कराने का भी मामला है। 21 अक्टूबर को गोयल और ओली की मुलाकात के बाद पार्टी में उभरे विवाद समेत कई मुद्दों पर दोनों नेताओं के बीच गतिरोध चल रहा है। दूसरी ओर 18 नवंबर की सुबह ओली काठमांडू में शीतलनिवास में राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति विद्या भंडारी से मिलने गए। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, चीनी राजदूत होउ यांक्वी ओली से मिलने प्रधानमंत्री आवास गयी थीं और पार्टी के भीतर मतभेद की पृष्ठभूमि में उनसे राजनीतिक विचार-विमर्श किया। ओली और प्रचंड ने सत्ता को लेकर समझौते पर सहमत होने के बाद सितंबर में अपने मतभेद दूर किए थे, जिससे पार्टी में महीनों से चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया था।

सच्चाई यह है, ओली और प्रचंड एक दूसरे की बैठकों का परोक्ष रुप से बहिष्कार कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ओली ने कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष के नाते नवंबर के पहले सप्ताह में एक बैठक बुलाई थी, जिसमें सीपीएन की कार्यवाहक अध्यक्ष प्रचंड ने बैठक में जाना जरुरी नहीं समझा। प्रचंड ने अपनी ओर से एक अनौपचारिक बैठक बुलाई है। हालाँकि इसे ओली पर दबाव बनाने के लिए सांकेतिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। इससे पूर्व प्रचंड ने सचिवालय में मीटिंग बुलाई जाने की मांग की थी, जिसे ओली ने ठुकरा दिया था। साथ ही धमकी भी दी थी, यदि उनकी अनुमति के बगैर पार्टी की बैठक बुलाई गई तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। प्रचंड गुट को सीनियर लीडर माधव कुमार नेपाल का समर्थन हासिल है। सीपीएन में स्थाई समिति के सदस्य मत्रिका यादव बताते हैं, बैठक में ओली ने यह कहते हुए आने से मना कर दिया था, कमेटी उनके खिलाफ फैसला ले लेगी। नेपाल की घरेलू राजनीति में चीन की ओर से खुलेआम हस्तक्षेप और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पार्टी के सह अध्यक्ष प्रचंड के बीच लगातार बैठकों का नतीजा सिफर ही रहा है। एक बार फिर नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां कुछ महीने पहले खड़ी थी। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी टूट की कगार पर पहुंच गई है। प्रचंड के मुताबिक ओली ने रास्ते अलग करने का फैसला कर लिया है। माना जा रहा है कि पार्टी के बंटवारे की सूरत में ओली की कुर्सी चली जाएगी। दूसरी ओर भारत को लेकर ओली का रुख नरम पड़ता दिख रहा है। एक बार फिर भारत के साथ बातचीत शुरु करने को उत्सुक हैं। ऐसे सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत के प्रति नरमी की वजह से कहीं चीन को ओली चुभने तो नहीं लगे हैं? क्या इसी वजह से उसने ओली के सिर से हाथ उठाते हुए प्रचंड को उकसा दिया है? नेपाल के बड़े अखबार काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुष्प कमल दहल खेमे के नेताओं का दावा है कि केपी शर्मा ओली ने रास्ते अलग करने का ऐलान कर दिया है। 

आज पार्टी जिस मोड़ पर खड़ी है वह एक दिन होना ही था, क्योंकि दो पार्टियों के मिलन के बाद से ही समस्याएं पैदा होने लगी थीं। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म ओली के सीपीएन-यूएमएल और दहल की पार्टी सीपीएल (माओवादी) के विलय से हुआ था। चूंकि, दोनों पार्टियों की विचारधारा अलग थी, इसलिए शुरुआत से ही यह आशंका थी कि यह एका अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकेगा। विलय के करीब डेढ़ साल बाद पार्टी के मतभेद खुलकर सामने आ गए। 11 सितंबर को युद्धविराम पर पहुंचने से पहले प्रचंड और उनके समर्थक नेपाल, खनल और गौतम ने ओली को लगभग इस्तीफे के लिए घेर लिया था। स्टैंडिंग कमेटी के 31 सदस्यों ने प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष के पद से उनका इस्तीफा मांग लिया था। 44 सदस्यों वाली स्टैंडिंग कमेटी में ओली अल्पमत में हैं। उनके साथ करीब 14 सदस्य हैं, जबकि प्रचंड के पास 17 जबकि नेपाल के साथ 13 सदस्य हैं। 

 ( लेखक सीनियर जर्नलिस्ट और रिसर्च स्कॉलर हैं। ) 


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