राष्ट्रगान में बदलाव के लिए सुब्रमण्यम स्वामी ने पीएम को लिखा पत्र, ट्विटर पर लिखा ये पोस्ट

नई दिल्लीः बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने राष्ट्रगान में बदलाव के लिए पीएम मोदी को पत्र लिखा है. स्वामी ने पीएम मोदी को भेजे गए इस पत्र को ट्विटर पर भी शेयर किया है. उन्होंने खत में कहा है कि राष्ट्रगान 'जन गण मन...' को संविधान सभा में सदन का मत मानकर स्वीकार कर लिया गया था. उन्होंने आगे लिखा है, 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के आखिरी दिन अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने बिना वोटिंग के ही 'जन गण मन...' को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार कर लिया था. हालांकि, उन्होंने माना था कि भविष्य में संसद इसके शब्दों में बदलाव कर सकती है. स्वामी ने लिखा है कि उस वक्त आम सहमति जरूरी थी क्योंकि कई सदस्यों का मानना था कि इस पर बहस होनी चाहिए, क्योंकि इसे 1912 में हुए कांग्रेस अधिवेशन में ब्रिटिश राजा के स्वागत में गाया गया था.

विश्व महिला दिवस पर विशेष: हौसले की दवा ने दी कैंसर को मात

 यूरेशिया संवाददाता


मुजफ्फरनगर। कैंसर का नाम सुनते ही जीवन खत्म होता नजर आने लगता है मगर ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने अपनी जीवटता से कैंसर को हरा दिया। एक ऐसी ही महिला हैं ऊषा देवी, जिन्होंने अपने हौसले से खुद को ही नहीं अपने परिवार को भी बिखरने से बचा लिया। अपने इसी हौसले के कारण वह आज पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपने परिवार के साथ अच्छे से जीवन यापन कर रही हैं। उन्होंने कैंसर के मरीजों को संदेश दिया है कि वह इस बीमार से लड़ें, हार नहीं मानें।


ऊषा देवी ने बताया सबसे पहले उन्हें पेट में दर्द की शिकायत हुई थी, जब वह डॉक्टर के पास पहुंचीं तो पता चला कि उनको आंतों का कैंसर है। यह सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। मन में बस यही ख्याल आया कि अब जिंदगी खत्म हो गई है। वैसे तो पूरे परिवार के साथ हंस-बोल लेती थीं लेकिन मन ही मन टूट गई थीं। कैंसर का डर उनके जीवन को डस रहा था। इस सबके बीच जीवनसाथी और बेटों का विश्वास मिला, तो हौसले की दवा ने कैंसर को मात दी। अब कैंसर को पीछे छोड़ स्वस्थ जीवन जी रही 62 वर्षीय ऊषा देवी अपने परिजनों की हिम्मत की भी दाद देती हैं।


करीब 2-3 वर्ष बिस्तर पर पड़े रहने के बाद भी नहीं हारी जिंदगी की जंग-


नई मंडी निवासी सुरेश पाल की पत्नी ऊषा देवी कैंसर से ग्रस्त उन सभी मरीजों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई हैं जो कैंसर की बीमारी से जूझ रहे हैं। करीब 4 वर्ष पूर्व आंतों के कैंसर को हराकर वह आज स्वस्थ जीवन जी रहीं हैं। ऊषा देवी बताती हैं कि 2014 में उन्हें पेट में दर्द की शिकायत हुई जो निरंतर बढ़ती गई। मेरठ और दिल्ली के कुछ नामचीन अस्पतालों में दिखाने के बाद भी आराम नहीं मिला। बेटों ने देहरादून के एक अस्पताल में चैकअप कराया। वहीं पता चला कि सभी आंत एकत्रित हो चुकी हैं, जिससे आंतों में कैंसर बन गया है। डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी। परिजनों ने साहस एवं सूझबूझ का परिचय देते हुए ऑपरेशन कराया उसके बाद 6 बार कीमोथौरेपी कराई गई। एक दौरान एक वर्ष तक पूरी तरह बिस्तर पर जीवन गुजारा। परिजनों के साथ से हिम्मत और हौसला मिला। 2017 के बाद कैंसर की दवा के सेवन से छुटकारा मिल गया। तब से अपने परिवार के साथ हंसी-खुशी जीवन बिता रही हैं।


हर छोटे-बड़े काम करती हैं-


आज ऊषा देवी कैंसर को मात देकर उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बाद भी सुबह-शाम नियमित रूप से घूमती हैं। गौसेवा भी करती हैं। साथ ही घर में छोटे बड़े काम करने में भी सक्षम हैं। खुद को स्वस्थ रखने के लिए अब उन्होंने योग को भी अपने जीवन का हिस्सा बना लिया है। 


कैंसर से लड़ें हार नहीं माने-


ऊषा देवी ने बातचीत के दौरान कहा कि कैंसर के मरीजों को इस बीमारी से लड़ना चाहिये, हार मान कर नहीं  बैठना चाहिये। दवा और इलाज से भी ज्यादा जरूरी है हिम्मत और हौसला। कैंसर के मरीजों को हिम्मत और हौसले से इस बीमारी से लड़ना चाहिये।  


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